असमंजस

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DTU Times

Ankur Shukla, 2nd year

गांधी जयंती के अवसर पर गांधी जी के विचारों से ओत – प्रोत इस कविता के माध्यम से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को मेरा प्रणाम…….

ये दुनिया देखती है मुझे ,
पूछती है , कहती है ,
क्या किया तूने ए पथिक दुनिया के लिए ,
मै भी असमंजस में हूँ ,
कि स्वयमेवादी बनूँ या समाजवादी बनूँ ,
खुद के लिए कुछ करूँ कि दुनिया के लिए बनूँ ।
ये दुविधा थी तो बड़ी मेरे लिए ,
पर समाधान बहुत छोटा मिला ,
कि न स्वयमेवादी का विचार हो ,
न समाजवादी का हो ,
आत्मचिंतन और आत्ममंथन का सवाल हो ,
क्या हो तुम ,
क्यों हो तुम ,
गर ये पता हो जाये तुम्हे ,
तब ही कुछ बात हो ।
सभी आश्वस्त होंगे तुमसे ,
अगर तुमने ये कर दिखाया ,
अंत में फिर भी एक प्रश्न रहेगा तुमसे ,
क्या , क्यों…

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