प्यार बिकता है यहां 

प्यार बिकता है भई यहाँ पर,

दाम बोलो तो लेलो,

कई तरह के है,

वो डीप लव वाला चाहिए

या फिर बस वो थोड़ा ऊपर ऊपर वाला,

और अगर कुछ अंतरंगिनिया चाहिए , 

तो समझ लो कुछ ज्यादा ही खरच हो जाएगा।

साइज भी बता दो, 

वो स्माल पाउच जो 2-3 महीने चले वो दें,

या वो 2-3 साल वाला बड़ा पाउच ।

अरे डब्बा ही चाहिए क्या ,

ये भी दो टाइप का है,

छोटा जो 5-6 साल तक बाँधे रखेगा,

और बड़ा वाला जिंदगी भर के लिए तुमसे 

पूछेगा क्यों किया ये तूने अपने साथ।

और अगर उससे भी न बने तो बताओ,

पौधा भी है,

वो मिल गया तो समझो,

प्यार से ऊपर वाले बंधन में बंध गए।

तो देखो 

गर पसंद आये कुछ दिल को 

तो प्राइस टैग पर लिखा है,

कितनी भावनाएं और आहें खर्चनी होंगी।

– अंकुर शुक्ल (5 अप्रैल 2017, दोपहर 12:40)

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कौन हूँ मैं

एक तालाब में कैद मछली हूँ मैं,

अँधेरे में कहीं गुम,

कठपुतली हूँ मैं,

कौन नचा रहा ,

कौन नाच रहा ,

इसकी फ़िक्र किसे है ,

बस अपने पात्र में ,

कहीं गुम एक अभिनेता हूँ मैं ।

एक कविता है जो मेरे सरे रूपों को वास्तविकता से मिलती है , मेरी ही वाणी में पूरी कविता सुनने के लिए नीचे की वीडियो देखें। अच्छी लगे तो LIke एंड Subscribe करें , और हाँ क्रिटिकल comments जरूर करें ।

 

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बहुत दिन हुए कुछ लिखा नहीं

बहुत दिन हुए कुछ लिखा नहीं

बहुत दिन हुए कुछ लिखा नहीं

आज शायद कुछ लिख दूँ ,

पर क्या माजरा तो ये है ,

अब तो कलम उठाने की जरुरत नहीं है ,

टेक्नोलोजी जो आ गयी है

रिप्लेस कर दिया सारा

पुराना जमाना , परंपरागत तरीका ॥

हिंदी में कलम से मोतियों को कागज पर उतरने के बजाए

अब तो बस  वर्डप्रेस खोलो

और गूगल के उपकार से

गूगल इनपुट टूल का उपयोग करके

कविता को यूँ ही लिख डालो ॥

कवी तो अपनी कविता का कभी ड्राफ्ट बनाते ही नहीं थे

अरे वो क्या कवी जो एक बार ड्राफ्ट बनाकर फिर कविता को पब्लिश करे

अरे अंकुर जी की सुने अगर, तो कविता तो एक भावना

बह गए तो बह गए ,

तभी उतार दिया जमीं पर उस कविता को तो सही,

वरना फिर एहसास होना तो मुश्किल है बाबू ॥

मैं तो बस यही करता हूँ,

जब मन मचला तो लिख डाली

ड्राफ्ट का चक्कर तो राइटर पालते हैं,

मैं तो एक सड़क किनारे खड़ा कवी हूँ,

पहचान लो तो सही, वरना क्या,

मैं तू यूँ ही कहानी कवितायेँ गढ़ता रहूँगा

अपने पथ पर चलता रहूँगा, आगे बढ़ता रहूँगा॥

–अंकुर शुक्ल (११:१४ शाम २२ दिसम्बर २०१६)

कवितामयी संसार

कवितामयी संसार में रहना भी,
कितना सुखमय होगा,
सत्ताइस नहीं
छियालीस नक्षत्रों से कवि
भविष्य बनाएंगे।
कविता मय अपने शरीर को
कभी उपमा कभी रूपक
अलंकार से सजाएंगे।
रसपान का तो नाम ही मत लीजिए
श्रृंगार, हास्य तो मुस्कान
और वीर भयानक
ह्रदय में उत्साह उमंग का
बीज बो जायेंगे।
बस वीभत्स से घृणा रुपी
काले घनघोर जलद
जब जुगुप्सा रुपी अम्ल वर्षा
से हर मन में
भयानक भय पनपाएंगे।
कहीं दूर देश से
अद्भुत आश्चर्य नायक
शांत और निर्वेद वातावरण का
कवितामयी संसार में
नव निर्माण कराएँगे॥

एक ही चाहत

कहते कहते हम कुछ कह गए ,

जो आप तक ना पहुंचा ,

आँखों से सुनने की जुर्रत न की आपने ,

होंठों को सीए हम रह गये ।

बुना तो बहुत कुछ था सपनों में हमने ,

दिए जले थे दिलो – दमाग में ,

एक हवा के झोकें से ,

बुझ के रह गये ।

बनायीं तो थी हमने मिलकर एक कहानी ,

पर वक्त की वास्तविकता में ,

कच्चे घड़े से ढह गये ।

हम इंतज़ार किस घड़ी का कर रहे थे ,

कि सुईयों की भूलभुलैया

में ही फँस के रह गये ।

संदेशा भी भेजा ,

कोशिश भी करी बताने की उन्हें ,

बस एक उत्तर के इंतज़ार में ही रह गये ।

अपने व्यहार ,

और सही समय के इंतज़ार ,

बस समय की मार में ही बह गये ।

अब भी आसरा है हमें ,

बुनते हैं ख्वाब अभी भी ,

कि तुम्हारे साथ , दुनिया से परे ,

प्रेम के सागर में बह गये ।

एक ही चाहत है,

कि  कुछ पल के लिए

इन भावनाओं की गुत्थी तुम पर गिर गये ।

If all this is possible

Sometimes I want to know you’re okay,

Sometimes I have to hear your voice,

Sometimes I want to see you,

Sometimes I wish,

If all this is possible.

We’re getting apart,

and I know what you want,

doesn’t matter what I wish,

and I know

There is still hope,

Maybe I don’t want to try,

Maybe I am afraid,

Maybe you’re happy,

Maybe I don’t have a choice,

Maybe I am late,

Maybe I am stuck.

This is a special day,

want to make it memorable, if I may.

Wish you a great life ahead,

Maybe I will never try instead

or

Maybe I never tried instead.

माँ

कुछ खास नहीं देने को पर,
एक पल की याद तो दे सकता हूँ,
तूने दिया ये जीवन हमको,
मैं एक मुस्कान तो दे सकता हूँ ।

ना जाने क्या क्या झेल तूने,
ना जाने क्या क्या है सहा,
बस हम ना रोएँ एक पल,
यही तेरा जीवन आधार बना।

कितनी ही गलतियां करी हैं मैंने,
माफ़ किया हर बार ही तैनें,
कई पाठ हैं सीखे तुझसे,
कई और तू सीखा रही,
अपनी खुशियों से पहले तूने,
हमको जाना, हमको माना।

इक-इक पल इस इस जीवन का,
फिर से जिन चाहूँ मैं,
हर इक दिन में,
तेरी खुशियों को,
चुन चुन कर गिनना चाहूँ मैं।

इस धरती पर
भगवान से पहले,
तेरी पूजा करना चाहूँ मैं।

तेरी हर एक इच्छा को,
शिरोधार्य कर सम्मान करूँ,
पूरे तपबल और शक्ति बल से,
उनको पूरा करना चाहूँ मैं।

मुसाफिर

दिये जलते हैं
दिए बुझते हैं
रौशनी होती है
अँधेरा जाता है
गम जाते है
ख़ुशी आती है
बस हम वहीँ रह जाते हैं ।
जहाँ से शुरू हुआ था ये कारवां
ठहरा है वहीँ पर है
कश्ती कहाँ है
किसको पता है
जाना कहाँ है
किसको पता है
बस चले जा रहे है
एक मुकाम हासिल हुआ है अभी तो
कुछ पल यहाँ भी सही
फिर तो जाना है वहीँ ||

 

Darkness and Light

River is flowing,
Quietly and happily,
The sun is shining,
Warm and with a smile,
Flowers are growing,
Bigger and bigger,
Moon is fading,
Slowly and steadily,
Light is spreading,
For a new beginning.

Get up, future awaits you,
Night has ended,
Open your tiny little eyes,
Fill your heart with
This sacred light,
Let go the darkness,
Of scary and fearful night.
But you have to ask;
One thing to yourself might?
Why the darkness and light,
Always fight?
Shadows of each other,
They are,
Cause without fight,
There is no light.

और एक मुस्कान – 2

“और एक मुस्कान ” रात के स्वप्न में प्रारम्भ हुई इस कविता का ,इस अंक में , मैं अरुणोदय से मिलाप करा रहा हूँ , जहाँ एक नयी मुस्कान ने जन्म लिया है।

जीवन बाँटने के लिए एक जीवन…

आस बटोहती आँखें ,

एक खुला हुआ हाथ , एक बढ़ा हुआ हाथ ,

एक बूँद पानी ,

मुस्काते हुए होंठ ,

तृप्त होने का एहसास ,

अरुणोदय की गर्माहट ,

कलियों की खिलखिलाहट ,

और एक मुस्कान…

और एक मुस्कान

रात कभी पूर्ण नहीं होती ,

हमेशा होती है चूँकि मै कहता हूँ ,

चूँकि मैं आश्वासन देता हूँ ,

दुःख के अंत में एक खुली हुई खिड़की ,

हमेशा होता है एक स्वप्न जो जागता रहता है ,

पूरी करने के लिए इच्छा , तृप्त करने की क्षुधा ,

एक उदार मन ,

एक बढ़ा हुआ हाथ , एक खुला हुआ हाथ ,

ध्यान देती आँखे ,

जीवन बाँटने के लिए एक जीवन….

स्वच्छता अभियान : निर्मल भारत की ओर एक कदम

पिछले कुछ दिनों से हम भारत में स्वच्छता अभियान की बातें सुन रहे हैं । यह अभियान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मदिवस पर श्रीमान नरेंद्र मोदी जी ने प्रारम्भ किया है । यह अभियान नागरिकों की मानसिकता को परिवर्तित करने का अनोखा तरीका साबित हो सकता है , यदि सही से कार्यान्वित किया जाय ।

भारत की जो विश्व भर में साफ सफाई को लेकर छवि है , वह विचार करने योग्य है । इसका कारण हम सभी नागरिक हैं । हम अपने घर साफ स्वच्छ रखना चाहते हैं , परन्तु सार्वजानिक स्थलों को जैसे कूड़ा-खाना ही समझते हैं । सार्वजानिक स्थलों को स्वच्छ रखना भी हम नागरिकों का कर्तव्य है , जब हम यह बात अपने मस्तिष्क में बैठा लेंगे , तब जाकर प्रधानमंत्री जी के स्वच्छता अभियान को सफलता मिलेगी ।

एक घटना, इसी तथ्य जुड़ी हुई , कहीं पढ़ रहा था मैं । एक भारतीय महानुभाव एक बार पेरिस की यात्रा पर गए परन्तु भारतीय लक्षणों को भारत में न छोड़ सका । सड़क पर चलते चलते एक बार किसी वस्तु के पैकेट को यूँ ही सड़क पर फेंक दिया । उधर से एक महानुभाव ने बड़ी ही सहज़ता से उसे उठाकर कूड़ेदान में डाला और उन्होंने यह कार्य उतनी ही ख़ुशी और सहज़ता से किया , कि जैसे यह उनका दैनिक कार्य हो । हमें इन बातों , इन कथाओं , इन घटनाओं से सीख लेनी चाहिए । एतैव तातपर्य यह ही है कि हमें अपने विचारों को बदलकर देश के हित में सोचना होगा ।

और सिर्फ समस्या स्वच्छता की ही नहीं है , कूड़ा निस्तारण की भी है। कैसे और कहाँ , साफ़ सफाई से निकले कूड़े को रखा जाय ? कैसे इसे प्रयोग किया जाय ? भारत में इसकी भी बड़ी समस्या है । प्रधानमंत्री जी को स्वच्छता अभियान के साथ साथ solid waste management पर भी कार्य करने की आवश्यकता है ।

विभिन्न देश कूड़े का उपयोग उर्वरक तथा बिज़ली उत्पादन में कर रहें हैं , भारत में कही भी ऐसा बड़ा सयंत्र नहीं है । बल्कि यहाँ कूड़े को शहरों के बाहर एक बड़े स्थान पर डम्प करते हैं । इन डंपिंग प्लेसेस के आस पास रहने वाले लोगों में कूड़े के ढेर की वजह से विभन्न प्रकार की बीमारियां फैलती हैं । वहां की उपजाऊ जमीन , रिसने वाले द्रव्य के कारण बंजर भूमि में बदल रही है । ये केवल तथ्य नहीं है , इन बातों के ठोस आकड़ें मौजूद हैं । विभिन्न संस्थाएं जैसे उनिसेफ के सर्वै में ये आकड़ें हमें रोज़ ही दीख पड़ते हैं । अतः प्रधानमंत्री जी से मेरा निवेदन है कि इस ओर भी अपना ध्यान आकर्षित करें ।

कहानी शुरू हुई थी रुक सी गयी

दिल में उठा था जो उमंगो का सागर ,
थम सा गया है ,
वो हवा की सोंधी सी खुशबु ,
कहाँ गम हो गयी ,
वो चन्द्रमा की शीतल रोशनी ,
मिट सी गयी,
कहानी शुरू हुई थी,
रुक सी गयी।
मेरे सपनो को पर लग गए थे,
कहाँ उड़ चले थे वो,
उन्हें पता था नही,
उन्हें पता था नही,
उड़ के आना है यहीं।
यही अपना आसरा है,
तुझे खुद का ही सहारा मिलेगा,
किसी से याचना छोड़ दे,
किसी को जांचना छोड़ दे,
ये दुनिया बड़ी ढोंगी है,
अपने आंसू बहाना छोड़ दे,
ये आंसू बड़े कीमती हैं,
यु मुस्कुराना छोड़ दे,
मुस्कुराने के दिन होते बड़े काम हैं,
यूँ खिलखिलाना छोड़ दे ,
कहानी शुरू हुई थी रुक सी गयी।

असमंजस

गांधी जयंती के अवसर पर गांधी जी के विचारों से ओत – प्रोत इस कविता के माध्यम से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को मेरा प्रणाम…….

ये दुनिया देखती है मुझे ,
पूछती है , कहती है ,
क्या किया तूने ए पथिक दुनिया के लिए ,
मै भी असमंजस में हूँ ,
कि स्वयमेवादी बनूँ या समाजवादी बनूँ ,
खुद के लिए कुछ करूँ कि दुनिया के लिए बनूँ ।

ये दुविधा थी तो बड़ी मेरे लिए ,
पर समाधान बहुत छोटा मिला ,
कि न स्वयमेवादी का विचार हो ,
न समाजवादी का हो ,
आत्मचिंतन और आत्ममंथन का सवाल हो ,

क्या हो तुम ,
क्यों हो तुम ,
गर ये पता हो जाये तुम्हे ,
तब ही कुछ बात हो ।

सभी आश्वस्त होंगे तुमसे ,
अगर तुमने ये कर दिखाया ,
अंत में फिर भी एक प्रश्न रहेगा तुमसे ,
क्या , क्यों तुमने ये कैसे पाया ?

मेरी ज़िन्दगी

ये ज़िन्दगी क्या सिखाती है ,
इस दुनिया के गुलदस्ते में तुम्हे
कैसे सजाती है ,
कुछ ऐसे पल आएंगे ,
जहाँ कुछ कर नहीं सकते ,
और यूँ ही मर नहीं सकते ,
हँस नहीं सकते , रो भी नहीं सकते,
यूँ देखकर जी नहीं सकते ,
ज़हर का घूंट पी नहीं सकते ।

अभी बहुत कुछ बाकी है,
ये दुःख तो कुछ पलों की झांकी है ,
ये सिलसिले यूँ ही चलते आये हैं ,
इन इक्कीस बरसों में ,
कई बार आँसू भी टपकते आयें हैं ।

पर हर पल से एक सबक लेना सिख गया हूँ ,
दुनिया के दुःख लेना सिख गया हूँ ।
जो चाहता जिस चीज़ को जितनी शीघ्रता से ,
वही भागता है उससे उतनी तीव्रता से ।
जो इनके पीछे भागना बंद पाये ,
और जिसको ये ज़िन्दगी न लुभाये ,
कुछ कर पाने की लालसा हो जिसके मन में ,
और ताकत और हिम्मत हो तन में ,
उसको यूँ ही जीना पड़ता है ,
हर गम का घूँट पीना पड़ता है ।

अभी इस धरती पर इतना वक़्त नहीं है गुजरा ,
पर दुखों के नाच का यही है मुजरा ,
ज़िन्दगी को सवाँरना सीखना पड़ता है ,
वरना उसे बिगड़ते देख चीखना पड़ता है ।

अभी वक़्त है , सवाँर लो ,
इस कविता के मर्म को पहचान लो ।
अभी तो तुम जवान हो ,
हष्ट पुष्ट और बलवान हो ,
अक्ल से भी बुद्धिमान हो ,
इस बात को जेहन में उतार लो ,
सभी को ख़ुशी बांटों ,
और उन के गम उधर लो ।
(BOPB)

कौन हो तुम -2

अस्तित्व से लड़ाईयाँ चलती रहेंगी, जब तक इस दुनियां में हो। कुछ इन्ही लड़ाईयों से दो पंक्तियों की कविताएं निकलती हैं और यहां छप जाती हैं, तो उन्ही पुरानी लाइनों को आगे बढ़ा रहा हूँ,

कौन हो तुम,

चोर

क्या कीमती वस्तु है तुम्हारे पास,

मेरा व्यक्तित्व।

– अंकुर शुक्ल ( 13 अप्रैल 2017, शाम 3:02)
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कौन हो तुम,

जब कभी अस्तित्व को लेकर झगड़ा होता है मेरा खुद से, तो शायद ऐसी कुछ पक्तियां लिख देता हूँ। शांत तो मन तब भी नहीं होता बल्कि कुछ विचार योग्य प्रसंग और जुड़ जाते हैं। देखते हैं अगर आपके साथ भी कुछ ऐसा ही होता है या नहीं,

कौन हो तुम,

मैं

मैं नहीं हूं,

अस्तित्व जिससे था,

वो ही नहीं है अब।

-अंकुर शुक्ल (8 अप्रैल, 12:58 दोपहर) 

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प्यार बिकता है भई यहाँ पर

प्यार बिकता है भई यहाँ पर,
दाम बोलो तो लेलो,
कई तरह के है,
वो डीप लव वाला चाहिए
या फिर बस वो थोड़ा ऊपर ऊपर वाला,
और अगर कुछ अंतरंगिनिया चाहिए , 
तो समझ लो कुछ ज्यादा ही खरच हो जाएगा।
साइज भी बता दो, 
वो स्माल पाउच जो 2-3 महीने चले वो दें,
या वो 2-3 साल वाला बड़ा पाउच ।
अरे डब्बा ही चाहिए क्या ,
ये भी दो टाइप का है,
छोटा जो 5-6 साल तक बाँधे रखेगा,
और बड़ा वाला जिंदगी भर के लिए तुमसे 
पूछेगा क्यों किया ये तूने अपने साथ।
और अगर उससे भी न बने तो बताओ,
पौधा भी है,
वो मिल गया तो समझो,
प्यार से ऊपर वाले बंधन में बंध गए।
तो देखो 
गर पसंद आये कुछ दिल को 
तो प्राइस टैग पर लिखा है,
कितनी भावनाएं और आहें खर्चनी होगीं।।
-Ankur Shukla